Shamsher Bahadur Singh ka Jivan Parichay

इस आर्टिकल में हम आपको शमशेर बहादुर सिंह के बारे में बताने जा रहे हैं। इस आर्टिकल में आप उनके बारे में पूरा विस्तार से जान पाएंगे।

 

 

 

 

भारतीय हिंदी साहित्य के आधुनिक हिंदी कवियों में शमशेर बहादुर सिंह एक परिचित नाम है। इन्हे हिंदी कविता साहित्य में प्रगतिशील कवि माना जाता है। शमशेर बहादुर सिंह को हिंदी भाषा तथा उर्दू भाषा में समान रूप से विद्वता प्राप्त है। प्रयोगवादी तथा नयी कविता लेखन करने वाले कवि समूह में इन्हे प्रथम पंक्ति में स्थान मिला हुआ है।

 

 

 

 

शमशेर बहादुर सिंह भाषा शैली पर अंग्रेजी भाषा के कवि विद्वान एजरा पाउंड का प्रभाव दिखाई देता है। शमशेर बहादुर सिंह को 1951 में ‘दूसरा सप्तक’ रचनाकृति के लिए पहचाना जाता है। इन्होने कविता लेखन के समान ही चित्रों, कलाकृतियों को भी मूर्तरूप देने का प्रयोग किया है।

 

 

 

 

 

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शमशेर बहादुर सिंह का जन्म निम्न मध्यम वर्गीय व्यक्ति के घर 13 जनवरी 1911 को देहरादून (जो उस समय संयुक्त उत्तर प्रदेश का हिस्सा था) में हुआ था। शमशेर बहादुर सिंह के पिता का नाम तारीफ सिंह तथा माता का नाम परमदेवी था। शमशेर बहादुर सिंह के छोटे भाई का नाम तेजबहादुर सिंह था।

 

 

 

 

वह शमशेर बहदुर सिंह से उम्र में दो वर्ष छोटे थे। शमशेर बहादुर सिंह की माता परमदेवी अपने दोनों पुत्रो पर प्यार लुटाते हुए इन्हे राम लक्ष्मण की जोड़ी कहती थी। मात्र 8 – 9 वर्ष की उम्र में ही बहादुर सिंह को माता की ममता मयी छाया से वंचित होना पड़ा था।

 

 

 

 

परन्तु शमशेर बहादुर और तेजबहादुर की जोड़ी मृत्यु समय तक बनी रही। आधुनिक हिंदी कविता में ‘अज्ञेय’ और शमशेर बहादुर सिंह का कृतित्व दो विपरीत दिशा का संवाहक कहा जा सकता है क्योंकि ‘अज्ञेय’ की कविता लेखन कला में वस्तु और रुपकार के मध्य संतुलित प्रवृत्ति दृष्टिगोचर होती है।

 

 

 

 

जबकि शमशेर की कविता रचना में शिल्प कौशल जागरूकता की प्रधानता होती है। इस प्रकार तुलनात्मक दृष्टि से शमशेर और अज्ञेय को क्रमशः दो अंग्रेजी भाषाओ के कविद्वय एजरा पाउंड और इलियट प्रभावित हुआ कहा जा सकता है।

 

 

 

 

शमशेर बहादुर सिंह को 18 वर्ष की अवस्था में ही 1929 में जीवनसाथी के रूप में धर्मवती का साथ मिला परन्तु क्षय रोग के कारण ही 1935 में धर्मवती ने शमशेर बहादुर सिंह का साथ छोड़कर अनंत की यात्रा पर निकल गयी। शमशेर बहादुर सिंह के लिए यह बहुत कठिन समय था।

 

 

 

 

24 वर्ष की अवस्था में ही शमशेर बहादुर सिंह को उनके जीवन का यह अभाव अपूरणीय क्षति थी परन्तु कवि हृदय शमशेर बहादुर ने इस अभाव को अपनी कविता के माध्यम से सदैव जीवित रखा। काल ने जिस क्रूरता के साथ इनके जीवनसाथी छीन लिया उसे यह जीवट कवि अपनी कविता के माध्यम से सदा के लिए अमर बनाते हुए काल से होड़ लेते रहे।

 

 

 

 

शमशेर बहादुर सिंह युवावस्था में वामपंथी विचारधारा और प्रगतिशील साहित्य के प्रभाव में थे। शमशेर बहादुर सिंह को निम्न मध्यम वर्गीय व्यक्ति का जीवन व्यतीत करना पड़ा था। आधुनिक अंग्रेजी भाषा काव्य में काव्य शैली के नवीन प्रयोग के लिए एजरा पाउंड को स्वीकार किया गया है।

 

 

 

 

शमशेर बहादुर सिंह अपने वक्तव्य के माध्यम से एजरा पाउंड के प्रभाव की मुक्त कण्ठ से सराहना करते हुए कहते है टेक्कीन में एजरा पाउंड शायद मेरा सबसे बड़ा आदर्श है। आधुनिक अंग्रेजी भाषा काव्य में शिल्प को प्रधानता देने का श्रेय एजरा पाउंड को ही दिया जाता है।

 

 

 

 

वस्तु की अपेक्षा रूपविधान एजरा पाउंड की रचना कृतियों में अधिक सजगता से दृष्टिगत होती है। शमशेर बहादुर सिंह की शिक्षा का आरंभ देहरादून से हुआ तथा इन्होने हाईस्कूल तथा इंटरमीडिएट की परीक्षा गोंडा जनपद से दिया। इसके साथ ही शमशेर बहादुर सिंह ने इलाहाबाद जनपद से बीए की शिक्षा पूर्ण किया परन्तु किसी कारणवस इन्हे एमए की शिक्षा पूर्ण करने में सफलता नहीं प्राप्त हुई।

 

 

 

 

शमशेर बहादुर सिंह ने उकील बंधुओ से 1935 – 36 में पेंटिंग कला सीखने में सफल हुए। इन्होने कई पत्र, पत्रिका, कहानियो के संपादन में सहयोग किया जिनमे कहानी, नया साहित्य, रूपाभ, मनोहर कहानियां, नया पथ, माया आदि का समावेश है।

 

 

 

 

हिंदी, उर्दू कोष प्रोजेक्ट के सम्पादकीय कार्यो का संचालन भी शमशेर बहादुर सिंह ने किया। इन्हे विक्रम विश्वविद्यालय में ‘प्रेमचंद सृजन पीठ’ का अध्यक्ष पद होने का गौरव प्राप्त था। शमशेर बहादुर सिंह को दूसरा तार सप्तक कवि कहा जाता है।

 

 

 

 

शमशेर बहादुर की काव्य कृतियों में बिंब, उपमान तथा संगीत ध्वनियों के माध्यम से चमत्कार के साथ ही वैचित्र्यपूर्ण आघात उत्पन्न करने की चेष्टा के दर्शन अवश्य होते है परन्तु उसमे किसी केन्द्रगामी विचार तत्व के दर्शन संभव नहीं होते है।

 

 

 

 

अभिव्यक्ति की वक्रता के कारण ही शमशेर बहादुर सिंह की रचनाकृतियो में वर्ण विग्रह तथा वर्ण संधि को आधार बनाकर नवीन शब्द योजना का प्रयोग करते हुए चमत्कारिक आघात देने की प्रवृत्ति किसी ठोस विचार तत्व की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण रहती है।

 

 

 

 

शमशेर बहादुर सिंह की काव्य कृतयो में मुक्त साहचर्य तथा असंबद्धता जनित दुरूह तत्व दृष्टिगोचर होते है तथा इनके अभिव्यक्ति कारक में अधूरापन झलकता है। इनकी कविताओं में उलझनपूर्ण कविताओं की अधिकता है जिनमे शब्द के साथ खिलवाड़ करने तथा शब्द मोह के प्रति अधिक जागरूक होने के भाव प्रदर्शित होते है।

 

 

 

 

इसके आठ ही शब्द संयोजन को आधार बनाकर संगीत ध्वनि उत्पन्न करने की प्रवृत्ति के दर्शन होते है। शमशेर बहादुर सिंह की कविताओं में आधुनिक काव्यबोध की निकटता अधिक है जिसमे पाठकगण तथा श्रोतागण की बीच सहयोग की स्थिति की स्वीकारोक्ति है।

 

 

 

 

इनकी कविताओं का बिंब स्वरुप पूर्ण रूप से जुड़ा हुआ ‘रेडीमेड’ नहीं कहा जा सकता है। शमशेर बहादुर की कविताओं में ‘सामाजिक’ आस्वादन को पूर्णरूप से छूट मिलती है। इस प्रकार शमशेर बहादुर सिंह की कविता कृतियों के अमूर्तन की प्रवृत्ति अपने पूर्ण शुद्ध रूप में आकार ग्रहण करती हुई दिखाई पड़ती है।

 

 

 

 

शमशेर बहादुर सिंह की काव्य रचना में उर्दू भाषा की गजल से प्रभावित होने पर भी इनके काव्य शिल्पो में नवीनतम रूप के दर्शन होते है। प्रयोगवाद तथा नयी कविता के पुरस्कार प्राप्तकर्ता के रूप में शमशेर बहादुर सिंह का अग्रणी स्थान है इनकी रचना प्रकृति को हिंदी भाषा साहित्य में अप्रतिम माना जाता है जो अनेक संभावनाओं से युक्त रहती है।

 

 

 

 

हिंदी के नवीन कवियों में शमशेर बहादुर सिंह प्रथम पंक्ति के कवियों में शामिल है जिन्हे ‘अज्ञेय’ के साथ हिंदी भाषा साहित्य की कविताओं में रचना पद्धति को नयी दिशा उद्धारित करने का श्रेय जाता है। ‘अज्ञेय’ और शमशेर बहादुर सिंह ने अपनी लेखनी के माध्यम से छायावादोत्तर काव्य को गति प्रदान करने का कार्य किया है।

 

 

 

 

शमशेर बहादुर सिंह को हिंदी भाषा साहित्य में शारीरक ऐन्द्रीय सौंदर्य के अद्वितीय चितेरे होने के साथ ही प्रगतिवादी विचारधारा का आजीवन समर्थन करते रहे। शमशेर बहादुर सिंह ने स्वतंत्रता तथा क्रांति को अपनी निजी वस्तुओ की तरह अपने जीवन में स्थान दिया।

 

 

 

 

इन्हे ऐन्द्रिय जीवन के पूर्ण संवेदनशील चित्र देखने के पश्चात ‘अज्ञेय’ की भांति सौंदर्यवादी नहीं कहा जा सकता है। इनके वक्षस्थल में एक ऐसा सुदृढ़तापन है जो इनकी विनम्रता को विचलित, ढुलमुल नहीं बनने देता है तथा इसके साथ ही इन्हे ही चौखटे पर बंधने के लिए बाध्य भी नहीं करता है।

 

 

 

 

शमशेर बहादुर सिंह के प्रिय कवियों में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का नाम है। शमशेर बहादुर सिंह की कविताकृतियो में राग विराग के लिए गहरा तथा स्थायी जगह नहीं थी इनके लेखन कार्यो में अवसरवादी ढंग के विचार को अपनाने छोड़ने के लिए कोई स्थान नहीं था।

 

 

 

 

इन्होने अपने मित्र केदारनाथ अग्रवाल की भांति ही एक तरफ ‘यौवन की उमड़ती यमुनाओ’ का अनुभव भी किया था और दूसरी तरफ ‘लहू भरे ग्वालियर के बाजार में जुलूस’ भी देखने की हिम्मत थी।

 

 

 

इनके लिए निजता और समाजिकता के मध्य किसी प्रकार का अलगाव तथा विरोध संभव नहीं था बल्कि शमशेर बहादुर सिंह के विचार में दोनों ही एक अस्तित्व के दो किनारे थे।

 

 

 

 

शमशेर बहादुर ऐसे कवियों में थे जिन्हे मार्क्सवाद की क्रांतिकारी आस्था के साथ भारत की सुदीर्घ सांस्कृतिक परंपरा के लिए कोई विरोध नहीं था।

 

 

 

आपको यह आर्टिकल जरूर पसंद आया होगा। हमारी टीम ने इस आर्टिकल में शमशेर बहादुर सिंह के बारे डिटेल जानकारी देने की कोशिश की है और अगर कहीं भी त्रुटि हुई है तो कृपया कमेंट में बताएं।

 

 

 

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