रघुनाथ मुर्मू का जीवन परिचय | Raghunath Murmu Biography Hindi

हे दोस्तों, आज इस पोस्ट में हम आपको Raghunath Murmu Biography Hindi देने जा रहे हैं, आप इनके बारे में डिटेल पढ़ सकते हैं और आप यहां से रहीम दास की जीवनी Pdf भी पढ़ सकते हैं।

 

 

 

 

Raghunath Murmu Biography Hindi

 

 

 

 

 

 

 

 

रघुनाथ मुर्मू एक संथाली समुदाय से संबंध रखने वाले व्यक्ति थे। इनका जन्म 1905 में संथाल परगना में हुआ था। संथाल समाज में इन्हे धार्मिक नेता का दर्जा मिला हुआ है। संथाल समाज के लोग इनके चित्र को अपने घरो में लगाकर भगवान की तरह पूजा करते है। रघुनाथ मुर्मू ने 1941 (ओल लिपि) जिसे संथाली भाषा में ‘ओलचिकी कहा जाता है’ का अविष्कार किया था तब ओलचिकी भाषा में ही अपने नाटक का सृजन किया जिससे उन्हें संथाली समाज के एक बड़े नेता के रूप में स्थापित होने में मदद किया।

 

 

 

 

रघुनाथ मुर्मू की लोकप्रियता का अंदाज इस बात से लगता है कि प्रख्यात लोगो ने इन्हे महान उपाधियों से विभूषित किया था जो किसी भी व्यक्ति के लिए बहुत सौभाग्य की बात होती है। संथाली समाज के जूलियस तिग्गा ने रघुनाथ मुर्मू के लिए महान अविष्कार और नाटककार की संज्ञा प्रदान किया था। रघुनाथ मुर्मू के लिए जयपाल सिंह मुंडा ने नृवैज्ञानिक और पंडित कहकर प्रशंसा किया था।

 

 

 

 

चारु लाल मुखर्जी रघुनाथ मुर्मू को संथाली समाज का धार्मिक नेता की उपाधि से सम्मानित किया था। ‘दि संथाल ए ट्राइव इन सर्च ऑफ़ दि ग्रेट ट्रेडिशन’ नामक पुस्तक में प्रो मार्टिन उरांव ने रघुनाथ मुर्मू के ‘आंचलिकी’ की प्रशंसा करते हुए कहा कि रघुनाथ मुर्मू संथाली समाज के महान गुरु है। मयूर भंज आदिवासी सभा द्वारा रघुनाथ मुर्मू को ‘गुरु गोमके’ महान शिक्षक की उपाधि से अलंकृत किया था।

 

 

 

 

रघुनाथ मुर्मू ने 1977 में झाड़ग्राम के बेताकुंदरिडाही ग्राम में एक संथाली विश्व विद्यालय के शिलान्यास से भी संबद्ध थे। रघुनाथ मुर्मू (ओल लिपि) आंचलिकी के अविष्कार के जनक थे। इन्होने आंचलिकी में ही अपने नाटक का सूत्रपात किया तथा आज तक रघुनाथ मुर्मू को संथाली समाज का प्रतीक पुरुष माना जाता है। इन्होने संथाली समाज के लिए महत्वपूर्ण योग दिया है।

 

 

 

 

रांची में धुमकुरिया से रघुनाथ मुर्मू के आदिवासी साहित्य के उत्थान के लिए डी. लिट. की उपाधि से अलंकृत किया गया। 4 मई 1905 को जन्मे रघुनाथ मुर्मू ने 1941 में (ओल लिपि) आंचलिकी के अविष्कार के साथ ही (ओल लिपि) आंचलिकी भाषा में अपने नाटकों को मूर्तरूप दिया। संथाली समाज में रघुनाथ मुर्मू को सांस्कृतिक, सामाजिक एकता के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया गया है।

 

 

 

 

मयूभंज जिले की आदिवासी महासभा द्वारा रघुनाथ मुर्मू को गुरु गोमके (महान शिक्षक) की उपाधि से विभूषित किया गया। गुरु गोम के भाषा को माध्यम बनाकर सांस्कृतिक विरासत की एकता के लिए जो आंदोलन आरंभ किया उसे ऐतिहासिक आंदोलन कहा जाता है। संथाली भाषा तथा साहित्य के विकास में रघुनाथ मुर्मू का बहुत सराहनीय योगदान है।

 

 

 

 

इनके द्वारा भाषा, संस्कृति, स्क्रिप्ट पूंजी के पश्चात विकसित दोनों अक्षर अद्वितीय MODERN’VE है OL CHIKI लिपि (संथाली वर्णमाला) की 1925 में DULLY पर प्रकृति के साथ तुलना की गयी है। रघुनाथ मुर्मू द्वारा स्थापित किए गए (दिवस, व्यवस्था, तिथि, सप्ताह, महीना, वर्ष, चांद, क्लिप के अनुसार उसकी GODDET कैलेंडर आदि) चांद वर्ष और KHERWAL समुदाय में सर्वसम्मति के साथ स्वीकार किया जाता है।

 

 

 

 

फरवरी 1977 में बस्तर KUNDRY पश्चिम बंगाल में अखिल भारतीय सम्मेलन का आरंभ हुआ था जिसमे आरंभिक माह, बन कैलेंडर GODDET माघ’ के अनुसार माघ के पहले दिन के बाद संथाली नया वर्ष चांद क्लिप बना तथा अन्य भारतीय भाषा विज्ञान की भांति लोकप्रिय ‘माघ’ MULUGH के रूप में जाना जाता है। संथाली समुदाय के समान संकल्प से प्रस्तुत किया गया जहां पर मुख्य अतिथि दुमका (दोनों संथाल परगना) के रूप में अध्यक्ष जहाज DUBRAJTUDU की उपस्थिति थी।

 

 

 

 

इन सब बातो से रघुनाथ मुर्मू संथाली समाज में एक लोकप्रिय व्यक्ति के रूप में स्थापित हो गए थे जिन्होंने आजीवन संथाली समाज के प्रगति के लिए प्रगतिशील रहे ऐसे महान व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति की जीवन ज्योति 1 फरवरी 1982 को सदा के लिए बुझ गयी। संथाली समाज सदैव ही ऐसे महापुरुष का आजीवन ऋणी रहेगा।

 

 

 

 

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