मनोहर श्याम जोशी का जीवन परिचय और पूरी जानकारी

इस आर्टिकल में हम आपको मनोहर श्याम जोशी का जीवन परिचय और उनसे जुड़े तमाम चीजों की जानकारी यहां पर देने जा रहे हैं, आप इसे पढ़ें और पूरी जानकारी प्राप्त करें।

 

 

 

Manohar Joshi Biography in Hindi

 

 

 

 

मनोहर श्याम जोशी हिंदी धारावाहिक से जुड़ा हुआ एक परिचित नाम है। कई धारावाहिक के लिए कहानियां लिखी है। मनोहर श्याम जोशी राजस्थान के मध्यम वर्गीय कुमाऊंनी हिन्दू ब्राह्मण परिवार से संबद्ध थे। मनोहर श्याम जोशी का जन्म 9 अगस्त 1933 को राजस्थान के अजमेर में हुआ था।

 

 

 

 

इनके पिता का नाम प्रेम वल्लभ जोशी और माता का नाम रुक्मिणी देवी था। मनोहर श्याम जोशी के पिता और बड़े भाई बचपन में इनका साथ छोड़कर परलोक गमन कर गए अतः पूर्ण रूप से कम समय में ही इनके ऊपर परिवार का उत्तरदायित्व आ गया।

 

 

 

 

 

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जिससे इन्हे कष्टकर स्थिति का सामना करन पड़ा। मनोहर श्याम जोशी संघर्षशील और अंतर्मुखी स्वाभाव के व्यक्ति थे। मनोहर श्याम जोशी का परिवार शिक्षित परिवार था। इन्हे पिता प्रेम वल्लभ जोशी एक शिक्षाविद होने के साथ ही संगीत मे रुचि रखते थे।

 

 

 

 

प्रेम वल्लभ जोशी अजमेर के राजकीय महाविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत थे इन्होने विज्ञान विषय से स्नातक तथा इतिहास विषय से एमए तक की शिक्षा ग्रहण की थी। प्रोफेसर पद से त्यागपत्र देने के पश्चात इन्हे राजस्थान के उच्च राजकीय निदेशालय में प्रथम भारतीय प्रधानाध्यापक का सम्माननीय पद प्राप्त हुआ था।

 

 

 

 

प्रेम वल्लभ जोशी ने अपने सहपाठी गोरख प्रसाद के साथ सम्मिलित रूप से हिंदी भाषा में विज्ञान से संबंधित पुस्तकों की रचना किया था। प्रेम वल्लभ जोशी का ललित कला क्षेत्र में भी अधिकार था। पश्चिमी चित्रकला के तुलनात्मक अध्ययन की दिशा में भी इन्होने सराहनीय कार्य किया था।

 

 

 

 

प्रेम वल्लभ की शैक्षिक योग्यता, बुद्धिमत्ता का प्रभाव मनोहर श्याम जोशी को विरासत में प्राप्त हुआ था। मनोहर श्याम जोशी अपने पिता के प्रति लिखते हुए कहते है ‘मेरे पिता एक शिक्षाविद होने के साथ ही कला, संगीत के मर्मज्ञ भी थे। भारतीय संगीत के सम्मेलन के आयोजनों के साथ ही लखनऊ में मैरिस कॉलेज की स्थापना से संबंध होने का गौरव प्राप्त था।

 

 

 

 

संगीत विषयो पर आधारित इन्होने कई लेखो की रचना किया था परन्तु दुर्भाग्य से उन सभी पुस्तकों का प्रकाशन संभव नहीं हो पाया।’मनोहर श्याम जोशी की माता रुक्मिणी देवी भी कुमाऊंनी कुलीन ब्राह्मण वर्ग से संबंधित थी इनके साहित्यनुराम में इनके ननिहाल का बहुत बड़ा योगदान था।

 

 

 

 

रुक्मिणी देवी के मामा डिप्टी कलेक्टर थे उन्हें ब्रजभाषा, अंग्रेजी, संस्कृत भाषा, फ़ारसी, हिंदी भाषा तथा बंगला भाषा में भी विद्वता प्राप्त थी तथा उन्हें हिंदी साहित्य के इतिहास में बंगला भाषा से हिंदी भाषा में सर्वप्रथम अनुवाद करने का श्रेय प्राप्त था।

 

 

 

 

इन्होने आजीवन फ़ारसी भाषा से ब्रजभाषा में अनुवाद में अनुवाद के साथ ब्रजभाषा में कविताये लिखने समय का उपयोग किया। मनोहर श्याम जोशी के अनुसार उनकी माता रुक्मिणी देवी को किसी भी व्यक्ति की अनुकरण करने की अद्भुत कला थी।

 

 

 

 

वह किसी आवाज में अनुकरण करने में पारंगत थी अतः यह उनका गुण उनके बच्चो में आनुवांशिक रूप से आ गया। मनोहर श्याम जोशी की माता 1973 में अवसान हो गया। मनोहर श्याम जोशी की एक बहन थी उसका नाम भगवती था जो ‘छाया’नाम से कहानी लेखन करती थी।

 

 

 

 

मनोहर श्याम जोशी के ऊपर उनके बड़े भ्राता दुर्गादत्त जोशी का बहुत अच्छा प्रभाव था। मनोहर श्याम जोशी के चाचा को भी कविता, कहानी लेखन का शौक था। इस प्रकार मनोहर श्याम जोशी का पूरा परिवार ही कुलीन और शैक्षिक रूप से समृद्ध था।

 

 

 

 

मनोहर श्याम जोशी और डा. भगवती जोशी ने 6 फरवरी 1966 से अपनी जीवन यात्रा का आरंभ किया। डा. भगवती जोशी दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज में हिंदी की प्राध्यापिका के रूप में सेवारत थी। जोशी दम्पत्ति को तीन पुत्र रत्नो की प्राप्ति हुई जिनके नाम क्रमशः अनुपम, अनुराग और आशीष जोशी थे।

 

 

 

 

मनोहर श्याम जोशी के शैक्षिक जीवन का आरंभ अजमेर की एक सामान्य पाठशाला से आरंभ हुआ। यही पर अपने चाचा भोलादत्त जोशी के साथ रहते हुए मनोहर श्याम जोशी ने इंटरमीडिएट तक की शिक्षा ग्रहण किया। जोशी अपने छात्र जीवनकाल में एक मेधावी छात्र थे।

 

 

 

 

उन्हें अंग्रेजी विषय में विद्वता प्राप्त थी तथा अंग्रेजी विषय से बहुत लगाव भी था। मनोहर श्याम जोशी सदैव ही प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होते रहे तथा अंग्रेजी प्रश्न पत्रों का उत्तर अंग्रेजी में ही देते थे। हिंदी विषय में वह दौड़ नहीं सकते थे परन्तु अंग्रेजी विषय में सरपट भागते थे।

 

 

 

 

हिंदी विषय में इन्हे कभी भी पचास प्रतिशत से ऊपर अंक नहीं मिल पाया जबकि अंग्रेजी विषय में इन्हे शत प्रतिशत प्राप्त होता था। विद्याध्ययन के साथ साथ मनोहर श्याम जोशी विद्यालय के सभी कार्यक्रमों में पूर्ण रूप से भाग लेते थे।

 

 

 

 

मनोहर श्याम जोशी को ‘हिन्दू के विरुद्ध हिंदुस्तानी’ विषय की वाद विवाद प्रतियोगिता में विजय श्री प्राप्त हुई थी जिस कारण से इन्हे हिंदी के प्रख्यात लेखक ‘अज्ञेय’ की रचनाकृति ‘शेखर एक जीवनी’ का पुरस्कार गौरव प्राप्त हुआ था।

 

 

 

 

परन्तु इन्होने इस पुस्तक की उपेक्षा करते हुए उसे पढ़ना स्वीकार नहीं किया फिर उसे रख दिया कारण कि इनकी रुचि विज्ञान विषय में थी तथा इनकी इच्छा एक वैज्ञानिक बनने की थी। मनोहर श्याम जोशी ने इंटरमीडिएट की परीक्षा पूर्ण करने के पश्चात उच्च शिक्षा हेतु बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से सिविल इंजीनियर बनने के लिए दाखिल हुए।

 

 

 

 

इंजीनियर बनने के दौर में इन्होने प्रख्यात लेखक मुंशी प्रेमचंद की लिखी कहानी ‘सज्जनता का दंड’ पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ जिसके प्रभाव मे आकर मनोहर श्याम जोशी इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ दिया क्योंकि इन्हे इंजीनियर का व्यवसाय अनैतिक प्रतीत होने लगा था।

 

 

 

 

ततपश्चात मनोहर श्याम जोशी ने बी.एस.सी. की शिक्षा के लिए लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। लखनऊ में शिक्षा के समय इनका सम्पर्क कम्युनिस्ट विचाराधारा के लोगो से हुआ परन्तु अपनी पारंपरिक शिक्षा और लेखन पृष्ठ भूमि होने के कारण लेखन कला की तरफ आकृष्ट हो गए।

 

 

 

 

लेखन कार्य इ संबद्ध होने तथा स्टूडेंट यूनियन के कार्यो में सक्रियता के कारण इनकी शिक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। लीडरशिप तथा स्ट्राइक में समय बर्बाद करने के कारण बी.एस.सी. में इन्हे द्वितीय श्रेणी से ही संतोष करना पड़ा तथा शुल्क मुक्ति के साथ ही छात्रवृत्ति जैसी सुविधा मिलनी बंद हो गयी।

 

 

 

 

अतः मनोहर श्याम जोशी का एम. एस. सी. करने का स्वप्न पूर्ण न हो सका परन्तु इन्होने प्राइवेट शिक्षा के माध्यम से अंग्रेजी विषय में एम. ए. पूर्ण किया। लेखन कला की शिक्षा में मनोहर श्याम जोशी अपने चाचा भोलादत्त जोशी को अपना प्रथम गुरु स्वीकार करते है।

 

 

 

 

तथा निःसंकोच स्वीकार करते है कि लेखन की प्रेरणा और मार्ग दर्शन सर्वप्रथम इन्हे अपने चाचा भोलादत्त जोशी के सानिध्य में ही प्राप्त हुआ।

 

 

 

 

मनोहर श्याम जोशी को अपने चाचा भोलादत्त जोशी के निमंत्रण पर उनके पास श्मशान मार्ग से होकर जाना पड़ता था जिससे मनोहर श्याम जोशी को स्वाभाविक रूप से डर का सामना करना पड़ता था।

 

 

 

 

अतः वह अपने चाचा के पास नहीं पहुँच सके तथा डर के कारण उपहास का पात्र होने पर आधारहीन तर्क सुनकर उनके चाचा ने उन्हें लेखन करने का सुझाव दिया। अपने चाचा के सुझाव पर मनोहर श्याम जोशी ने इसी संदर्भ में एक लेख ‘मैं डर से क्यों डरता हूँ?’ को मूर्तरूप दे दिया।

 

 

 

 

इसमें भाषा की त्रुटियों को सुधारने के साथ ही भोलादत्त जोशी ने मनोहर श्याम जोशी को भविष्य में लेखन के लिए प्रोत्साहन दिया। प्रगतिशील लेखक संघ से प्रभावित होकर मनोहर श्याम जोशी ने कहानियो को आधार बनाकर अपने लेखन जीवन का शुभारंभ किया।

 

 

 

 

जिससे इन्हे प्रथम दो कहानियो में असफलता प्राप्त होने से कहानी लेखन को फाड़कर फेकना पड़ा पश्चात में इन्हे तीसरी कहानी लेखन में सफलता प्राप्त हुई तथा इन्होने कहानी ‘मैडिरा मैरून’ को सफलता पूर्वक मूर्तरूप प्रदान किया।

 

 

 

 

प्रख्यात लेखकगण भगवती चरण वर्मा, यशपाल तथा नागर जी के समक्ष लेखक संघ की बैठक में मनोहर श्याम जोशी ने अपनी कहानी का वाचन किया जिससे नागर जी प्रभावित हुए तथा जोशी जी को गले से लगा लिया। अब जोशी जी ने पूर्ण रूप से नागर जी को अपना बनाया।

 

 

 

 

नागर जी की शिष्यता का जोशी जी के ऊपर गहरा प्रभाव था। मनोहर श्याम जोशी जी ने प्रमुख समाचार पत्र ‘जनसत्ता’ परिशिष्ट के लिए विज्ञान, खेलकूद, साहित्य, कला, रंगमंच सिनेमा आदि विषयो पर लेखन आरंभ किया जिसके लिए इन्हे मात्र पांच हजार रुपये प्रति कालम की दर से पारिश्रमिक प्राप्त होता था।

 

 

 

 

पश्चात में जोशी जी ने वात्सायन जी के सुझाव पर हिंदी समाचार कक्ष में दो सौ पचास रुपये माहवार पर प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका ‘सरगम’ और सुदर्शन में हुआ था। जोशी जी अन्य कहानी गणेश जी ‘हंस’ में छपी गयी थी पश्चात मे भगवती चरण वर्मा की पत्रिका ‘उत्तरा’ में भी जोशी जी की दो कहानियो का प्रकाशन हुआ था।

 

 

 

 

केंद्रीय सूचना सेवा में मनोहर श्याम जोशी को बंबई के फिल्म उद्योग प्रभाग में पटकथा और भाष्य लेखक के रूप में नियुक्त किया गया था।

 

 

 

 

बंबई आने पर ही जोशी जी के लेखकन हृदय में फ़िल्मी दुनियां को लेकर विशेष रूचि जाग उठी तथा इन्होने उस दौरान फ़िल्मी पटकथाओं के साथ टिप्पणियों पर भी अपनी लेखनी चलाने का कार्य किया।

 

 

 

 

इन्होने पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देते हुए ‘नव पत्रकारिता’ की नीव रखा परन्तु जोशी जी को पत्रकारिता के लिए कम और व्यावसायिकता के लिए अधिकाधिक रूप से ख्याति मिली थी।

 

 

 

 

जोशी जी अज्ञेय की शिष्य मंडली से जुड़ने के पश्चात स्वयं को कविता लेखन की ओर प्रवृत किया परन्तु एक कवि के रूप में जोशी जी को अपनी कविताकृतियो को लेकर सदैव ही शंका बनी रही।

 

 

 

 

मनोहर श्याम जोशी के साक्षात्कार को वर्ष 1983 में ‘बातो बातो में’ के नाम से प्रकाशित किया गया था। मनोहर श्याम जोशी ने हिंदी भाषा की जानकारी रखने वाले लोगो के लिए ‘पटकथा लेखन एक परिचय’ के नाम से पटकथा लेखन के लिए उपयोगी तरीके के साथ महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराया है।

 

 

 

 

मनोहर श्याम जोशी की रचनाकृति ’21वी शदी’ को वर्ष 2001 मे प्रकाशित किया गया था जो उनकी अनेक प्रकार की रचनाकृतियो का संग्रह है जिसमे पूंजीवाद, मुक्तमंडी, ग्लोबलाइजेशन आदि विषयो पर चर्चा किया गया है। मनोहर श्याम जोशी ने अपने जीवनकाल में ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ और ‘वीकेंड रिव्यू’ के साथ लंबी अवधि तक संपादकीय कार्य से संबद्ध थे।

 

 

 

पत्रकारिता के उस दौर में मनोहर श्याम जोशी के आधुनिक प्रयोगो का विशेष रूप से उल्लेख मिलता है। धर्मयुग जैसी ख्यातिलब्ध पत्रिका में भी उनके लेख को उचित स्थान दिया जाता था। जोशी जी का पसंदीदा कार्यक्षेत्र प्रिंट मिडिया था जोशी जी के लिखे कई यात्रा वृतांत को आज भी प्रकाशित होने का इंतजार है।

 

 

 

 

मनोहर श्याम जोशी ने दूरदर्शन धारावाहिक के क्षेत्र में भी अपनी लेखनी का जादू चलाया है जिनमे से कुछ धारावाहिको को विशेष ख्याति प्राप्त हुई थी यथा कक्का जी कहिन, हमराही, मुंगेरीलाल के हसीन सपने, बुनियाद, गाथा आदि।

 

 

 

 

मनोहर श्याम जोशी ने अपनी लेखनी क्षमता से फिल्म की पटकथा लेखन में भी धाक जमाई तथा केंद्रीय सूचना विभाग के अपने कार्यकाल में इन्होने 250 से ज्यादा पटकथा लेखन और टिप्पणी लेख कार्य किया जिनमे ‘पापा कहते है’ ‘हे राम’ की पटकथा लेखन का शुमार है। वृहद लेखन कार्य के लिए मनोहर श्याम जोशी को अनेक पुरस्कार भी प्राप्त हो चुके है।

 

 

 

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