विद्यापति ठाकुर की जीवनी | Vidyapati Biography in Hindi

दोस्तों इस आर्टिकल में आप विद्यापति ठाकुर के बारे में विस्तार से पढ़ेंगे। इस पेज में विद्यापति ठाकुर के बारे में सम्पूर्ण जानकारी दी गयी है।

 

 

 

 

विद्यापति ठाकुर की काबू कृतियों में राधा कृष्ण का महत्वपूर्ण स्थान है। राधा कृष्ण को आधार बनाकर ही इन्होने श्रृंगार रस कविता का सृजन किया है। विद्यापति ठाकुर की रचनाओं में 1000 पद मिलते है जो आज के समय में लोकमानस के बीच गीत के रूप में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाये हुए है।

 

 

 

 

विद्यापति ठाकुर को महाकवि कोकिल के नाम से भी जाना ख्याति प्राप्त है। विद्यापति ठाकुर का जन्म बिहार राज्य के मधुबनी जिला में वर्ष 1350 से 1374 के बीच बीसवीं सदी में एक हिन्दू परिवार में हुआ था। विद्यापति ठाकुर के पिता का नाम गणपति ठाकुर और माता का नाम श्रीमती गंगा देवी था।

 

 

 

 

 

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विद्यापति की धर्मपत्नी का नाम मंदाकिनी देवी था। विद्यापति ठाकुर की दो संतान थी जिनमे एक लड़की थी जिसका नाम दुल्लहि था और एक लड़का था जिसका नाम हरपति था। महाकवि विद्यापति ठाकुर के जन्म को लेकर कई विद्वानों में मतभेद बना हुआ है क्योंकि इनके जन्म का कोई मूल और लिखित प्रमाण नहीं मिलता है।

 

 

 

 

विद्वानों का बहुमत विद्यापति ठाकुर की जन्मतिथि 1350 ही मानता है। इनका जन्मस्थान बिहार राज्य का मधुबनी जिला का बिसवां गांव माना गया है। यह मिथिला के निवासी थे। साहित्य क्षेत्र में अपना अहम स्थान रखने वाले बहुआयामी साहित्यकार विद्यापति ठाकुर के पिता बिसईबर वंश से संबंधित आठवीं पीढ़ी की संतान थे।

 

 

 

 

इनका नाम गणपति ठाकुर था। किवदंतियो के अनुसार गणपति ठाकुर को कोई संतान नहीं थी तब इन्होने कपिलेश्वर महादेव की सेवा आराधना के फलस्वरूप ही ऐसे मेधावी पुत्र रत्न की प्राप्ति संभव हुई। एक विद्वान रामवृक्ष बेनीपुरी ने विद्यापति ठाकुर की माता का नाम का उल्लेख हांसिनी देवी के रूप में किया है।

 

 

 

 

 

लेकिन विद्यापति ठाकुर की रचनाकृतियो से स्पष्ट होता है कि महाराज देवी सिंह की पत्नी हांसिनी देवी था। महाकवि विद्यापति ठाकुर एक मेधावी कवि थे। इनकी शिक्षा महामहोपाध्याय हरि मिश्र के सानिध्य में हुई थी। इनका संस्कृत, मैथिलि तथा अवहट्ट भाषाओ पर पूर्ण प्रभुत्व था।

 

 

 

 

विद्यापति ठाकुर की रचनाकृतियों में मैथिली, संस्कृत, अवहट्ट भाषा की धारा श्रृंगार रस के साथ प्रवाहित होती रहती है। विद्यापति ठाकुर की काव्य कृतियो में संस्कृत, मैथिली, अवहट्ट भाषा की माधुर्य सुंदरता के साथ श्रृंगार रस की झलक मिलती है।

 

 

 

 

 

हिंदी साहित्य मिथिला, संस्कृत भाषा के गौरव विद्यापति ठाकुर के जन्म के विषय में जिस प्रकार विद्वान का एकमत नहीं है उसी प्रकार विद्यापति ठाकुर की मृत्यु तिथि भी विवास्पद बनी हुई है। कई विद्वानों का बहुमत इनकी मृत्यु का समय 1440 से 1448 के बीच का समय मानते है।

 

 

 

 

विद्यापति का मृत्यु स्थान बिहार के बेगूसराय जिला का स्थान मऊ वाजिदपुर (विद्यापति नगर) माना गया है जो गंगा तट पर अवस्थित है। ऐसे मूर्धन्य मेधावी कवि को ‘महाकवि’ के उपाधि से सम्मानित किया गया है। कवि विद्यापति ठाकुर के माता पिता का नाम गणपति ठाकुर और गंगा देवी था।

 

 

 

 

 

इनकी धर्मपत्नी का नाम मंदाकिनी तथा लड़के लड़की का नाम हरपति तथा दुल्लहि था। विद्यापति ठाकुर की पुत्रवधु का नाम चन्द्रकला था। विद्यापति ठाकुर श्रृंगार रस की कविता की सृजनता के लिए जाने जाते है। इन्होने अपनी कविता रचना में राधा कृष्ण को माध्यम बनाकर श्रृंगार रस की कविता को मूर्तरूप देने में सफलता प्राप्त किया था।

 

 

 

 

 

इनकी कविता कृतियों में कीर्तिलता, पदावली मणिमञ्जरा नाटिका, भू परिक्रमा, गंगा वाक्यावली के साथ अन्य कविता कृतियों का गौरवपूर्ण स्थान है।

 

 

 

 

विद्यापति ठाकुर की अन्य कविता कृतियों में पदावली, कीर्तिपताका, वर्ष कृत्य, गया पत्तलक, कीर्तिलता, लिखनावली, दानवाक्यावली, शैवसर्वस्वसार, गोरक्ष विजय, भू परिक्रमा, गंगावाक्यावली, विभाग सार, मणि मंजरी, पुरुष परीक्षा, दुर्गा भक्ति तरंगिणी के नाम प्रमुख रूप से उल्लेखनीय है जो विद्यापति ठाकुर को एक महान कवि की श्रेणी में उचित स्थान दिलाते है।

 

 

 

दोस्तों उम्मीद है कि यह आर्टिकल आपको निश्चित ही पसंद आया होगा और आपको इसमें दी गयी जानकारी भी पसंद आयी होगी।

 

 

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