उमाशंकर जोशी की जीवनी और पूरी जानकारी

आज के इस नए आर्टिकल में हम आपको Umashankar Joshi Biography in Hindi देने जा रहे हैं, आप नीचे इनके बारे में पुरे डिटेल में पढ़ सकते हैं।

 

 

 

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उमाशंकर जोशी को हिंदी साहित्य जगत का प्रसिद्ध कवि और साहित्यकार के रूप में मान्यता प्राप्त है। इनका संबंध भारत के पश्चिमी राज्य गुजरात से है।

 

 

 

 

उमाशंकर जोशी एक प्रतिभाशाली कवि और लेखक के रूप में प्रख्यात थे। उमाशंकर जोशी का जन्म भारत के प्रश्चिमी प्रान्त गुजरात के साबरकाठा जिले के एक गांव में 21 जुलाई 1911 को हुआ था।

 

 

 

 

अपनी औपचारिक शिक्षा की पूर्णता के पश्चात वह असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भागीदार होने के लिए शिक्षा का परित्याग कर दिया। पश्चात में इन्होने बंबई विश्वविद्यालय से 1936 में मास्टर डिग्री प्राप्त करने में सफल हुए थे। उमाशंकर जोशी एक प्रतिभापूर्ण लेखक, कवि थे।

 

 

 

 

इन्हे ‘विश्वशांति’ कविता संग्रह की सृजनता और प्रकाशन के लिए 1931 में बहुत प्रसिद्धि प्राप्त हुई थी जो अनवरत विस्तारित होती गयी। इन्होने अपनी रचनाकृतियो में लघु कथाये, नाटक, उपन्यास, निबंध तथा आलोचना के साथ विभिन्न प्रकार के साहित्यो को मूर्तरूप दिया।

 

 

 

 

उमाशंकर जोशी को आधुनिक और गांधीवादी युग के प्रमुख साहित्यकारों में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। उमाशंकर जोशी को साहित्यिक रुचियों के साथ ही एक प्रोफेसर और सम्पादक होने का गौरव प्राप्त है। उमाशंकर जोशी ने गुजरात विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और विभाग प्रमुख पद को सुशोभित करने के उपरांत गुजरात विश्वविद्यालय के कुलपति पद का मान बढ़ाया।

 

 

 

 

उमाशंकर जोशी ने अपने जीवनकाल में राज्यसभा की सदस्यता ग्रहण की थी तथा साहित्य अकादमी के अध्यक्ष के रूप में सेवाएं प्रदान किया।

 

 

 

 

उमाशंकर जोशी की विद्वता को सम्मानित करते हुए 1979 में पुनः शांति निकेतन विश्वविद्यालय के कुलपति का गौरव बढ़ाने का अवसर प्राप्त हुआ था।

 

 

 

 

उमाशंकर जोशी को भारतीय परंपरा का अधिकाधिक ज्ञान था। महाकवि कालिदास की अमरकृति ;अभिज्ञान शाकुंतलम’ भावभूत के उत्तर रामचरितमानस की गुजराती भाषा में अनुवाद करने से उमाशंकर जोशी की विद्वता और मेधा ज्ञात होती है।

 

 

 

उमाशंकर जोशी द्वारा किया गया यह अनुवाद गुजराती भाषा साहित्य की अभिव्यक्ति क्षमता में वृद्धि प्रदान करने वाले साबित हुए।

 

 

 

 

उमाशंकर जोशी ने नवीन भावभंगिमा और नए कलेवर को सम्मिलित करके गुजराती कविता और साहित्य को नया स्वर प्रदान करने का जो अभिनव कार्य किया उनका वह साहित्यिक अवदान सम्पूर्ण भारतीय साहित्य में अनुपम स्थान रखता है।

 

 

 

 

एक कवि के रूप में उमाशंकर जोशी ने गुजराती भाषा की कविता को प्रकृति के सानिध्य से जोड़ते हुए आम जिंदगी के अनुभव से परिचित कराया और नयी शैली प्रदान करने में सफल हुए। प्राकृतिक जीवन के सामान्य प्रसंगों को लेकर तथा सामान्य बोल चाल की भाषा का प्रयोग करते हुए कविता सृज करने वाले भारतीय आधुनिकतावादी कवियों में उमाशंकर जोशी का अद्वितीय स्थान है।

 

 

 

 

उमाशंकर जोशी ने कविता लेखन के साथ ही साहित्य की अन्य विधाओं में विशेष रूप से साहित्यिक आलोचना में अमूल्य योगदान किया। गुजराती भाषा साहित्य में एक निबंधकार के रूप मे उमाशंकर जोशी को बेजोड़ लेखक माना जाता है।

 

 

 

 

उमाशंकर जोशी एक ऐसे ऐतिहासिक व्यक्ति के रूप में पहचाने जाते है जिनको स्वतंत्रता संग्राम संबद्ध होने तथा स्वतंत्रता की लड़ाई के दौर में जेल यात्रा करने का गौरव प्राप्त है।

 

 

 

 

उमाशंकर जोशी ने ‘छोटा मेरा खेत’ रचनाकृति के माध्यम से एक चौकोर कागज को खेत का रूप प्रदान करते हुए शब्दों के बीज बोने की सफल चेष्टा की है जिस शब्द रचना रूपी फसल को जितनी बार भी काटा जाय वह उतनी ही तीव्र गति से पुष्पित, पल्लवित प्रसारित होती है।

 

 

 

 

 

उमाशंकर जोशी ने कवि के रूप में कविता को माध्यम बनाकर खेती के रूपक में कवी कर्म प्रत्येक चरण बद्ध के प्रयास से रूप में पढ़ने योग्य है। एक कागज के पन्ने पर जिस स्थान को शब्द बद्ध किया गया है वह कागज का चौकोर पन्ना कवि हृदय उमाशंकर जोशी को एक चौकोर खेत की भांति प्रतीत होता है।

 

 

 

 

 

इस खेत में किसी अंधड़ के प्रभाव से (यहां कवि का विचार भावनाओ की आंधी है) किसी पल बीज की धुआई संभव हुई (यह बीज संरचना विचार तथा अभिव्यक्ति की है) यह मूल रूप से कल्पना का सहारा लेकर विकास पथ पर अग्रसर होता है तथा इसी विकसित होने की प्रक्रिया स्वरुप बीज स्वयं ही विगलित हो जाता है।

 

 

 

 

 

उससे शब्दों अंकुर निकलकर रचनाकृति अंततः पूर्ण स्वरुप ग्रहण करने में सफल होती है जिसे कृषि कर्म आधारित पुष्पित पल्लवित होने की स्थिति कहा जाता है। साहित्यिक रचना कृति से जिस अलौकिक रसधार का प्रस्फुटन होता है उसे पल में होने वाली लेखन रोपाई का परिणाम कहा जा सकता है।

 

 

 

 

 

इस अलौकिक रसधार की अनंतकाल होने वाली कटाई (इसे कालजयी साहित्य के रूप में संदर्भित किया गया है जिसे अगणित पाठको द्वारा अगणित बार पढ़ा जाता है) से भी किसी प्रकार कम नहीं होता है परन्तु निश्चित रूप से बढ़ता ही जाता है। खेत में पैदा होने वाला अन्न का समापन निश्चित है परन्तु साहित्यिक अन्न रस का कभी समापन नहीं होता है।

 

 

 

 

 

इस ‘छोटा मेरा खेत’ रचनाकृति के माध्यम से कवि हृदय उमाशंकर जोशी ने बहुत ही सुंदर अद्वितीय प्रयास किया है। कल्पना शक्ति का कुशल चित्रण करने वाले कवि हृदय उमाशंकर जोशी कविता ‘बगुलों के पंख’ को आधार बनाकर एक अतिसुंदर कविता को मूर्तरूप दिया है।

 

 

 

 

जिसमे कवि ने सौंदर्य शीलता का अपेक्षित भाव प्रकट करने के लिए कई प्रकार की युक्तियों का प्रयोग किया है जिसमे सौंदर्य के व्योरे का चित्रात्मक वर्णन करने के साथ ही अपने मन पर पड़ने वाले प्रभाव का उल्लेख किया है। वस्तुगत और आत्मगत का यह अद्भुत संयोग पाठकगण को मूल सौंदर्य से निकटता स्थापित करने में सक्षम होता है।

 

 

 

 

कवि उमाशंकर जोशी ने अपनी कल्पनाशीलता में काले बादल भरे आकाश में कतारबद्ध होकर उड़ते सफेद बगुलों का दृश्यावलोकन करता है। सफेद बगुलों की कतारबद्धता काले काले बादलो के ऊपर तैरती सांझ, श्वेत काया के समान प्रतीत होती है।

 

 

 

 

जिसमे कवि सब कुछ भूलकर ‘बगुला पंक्ति’ की मनोहरी छटा में उलझकर रह जाता है। कवि स्वयं को इस माया से बचाने की गुहार लगाता है क्या इस स्थिति को सौंदर्य से बंधने बांधने तथा विंधने की चरम अवस्था को व्यस्त करने का तरीका कहा जा सकता है?

 

 

 

 

उमाशंकर जोशी ने साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान दिया। इनकी साहित्य और शिक्षा में योगदान को व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त हुई। उमाशंकर जोशी को उनके अद्भुत और अद्वितीय लेखन कला के लिए कई विश्वविद्यालयो से डॉक्टरेट की मानद उपाधियाँ प्रदान करते हुए सम्मानित किया गया।

 

 

 

 

उमाशंकर जोशी को 1987 में ज्ञानपीठ पुरस्कार तथा 1973 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। अपनी कविता लेखन में संवेदनशीलता के साथ सौंदर्य रस का बोध कराने वाले कवि उमाशंकर जोशी ने भारत की शिक्षा साहित्य की सम्बृद्ध विरासत छोड़कर 19 दिसंबर 1988 को सदा के लिए चिरनिद्रा में शयन कर गए। इनके महाप्रयाण से गुजराती साहित्य के साथ ही भारतीय साहित्य की जो अपूरणीय क्षति हुई है उसकी पूर्णता कदापि संभव नहीं हो सकती है।

 

 

 

 

तो दोस्तों यह जीवनी आपको कैसी लगी, कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं और इसी तरह की जानकारी के लिए इस ब्लॉग को सब्स्क्राइब कर लें।

 

 

 

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