शाहजहां का इतिहास | Shahjahan Biography in Hindi

आज के इस आर्टिकल में हम आपको Shahjahan Biography in Hindi देने जा रहे हैं, आप यहां पर शाहजहां के बारे डिटेल जानकारी पा सकते हैं।

 

 

 

दिल्ली सल्तनत का मुगल बादशाह शाहजहां मुगलशाही में पांचवे क्रम पर था। शाहजहां के पिता का नाम जहांगीर था जो दिल्ली मुगलशाही के चौथे क्रम का बादशाह था। शाहजहां की माता का नाम जगत गोसाई, जोधाबाई था। जोधाबाई जोधपुर के राजपूत राजा उदयसिंह की पुत्री थी।

 

 

 

मुगल बादशाह शाहजहां का जन्म 5 जनवरी 1952 ई. को लाहौर में हुआ था। शाहजहां मुगल बादशाह जहांगीर का छोटा पुत्र था। उसका बचपन का नाम खुर्रम था। जहांगीर की मौत के उपरांत कम उम्र में ही शाहजहां को मुगल साम्राज्य का उत्तराधिकारी घोषित किया गया था।

 

 

 

शाहजहां को उसकी विलासितापूर्ण जिंदगी और न्यायप्रियता के साथ विश्वप्रसिद्ध इमारत ताजमहल के निर्माणकर्ता के रूप में याद किया जाता है जिसने अपनी बेगम आरज़ूमंदबानो (मुमताज महल) की याद में विश्वप्रसिद्ध ताजमहल का निर्माण करवाया था।

 

 

 

20 वर्ष की आयु में ही शाहजहां जहांगीर के शासन का एक शक्तिशाली आधार स्तंभ बन चुका था। शाहजहां बहुत ही तेज तर्रार, साहसी, कलाप्रेमी और रंगीन मिजाज बादशाह था। नूरजहां के भाई असफ खां की पुत्री आरजू बानो से 1611 में शाहजहां का विवाह हुआ था।

 

 

 

यही आरजू बानो बाद में मुमताज महल के नाम से विख्यात हुई जिसकी मृत्युदंड के उपरांत शाहजहां ने ‘मुमताज’ की याद में आगरा में विश्वप्रसिद्ध ताजमहल का निर्माण कराया।

 

 

 

शाहजहां और आरजू बानो के विवाह से शाहजहां की शक्ति में बढ़ोत्तरी हो गयी कारण कि जहांगीर के विश्वास पात्र कर्ता धर्ता, नूरजहां आसफ खां और उसके पिता मिर्जा गयास बेग पूर्णरूप से शाहजहां की विश्वसनीयता हासिल करने में सफल हो गए तथा शाहजहां के समर्थक बन गए।

 

 

 

जहांगीर की मृत्यु 1627 में होने के बाद दिल्ली सल्तनत का शासन शाहजहां के हाथ में आ गया। शाहजहां का शासनकाल मुगल शासन का स्वर्णयुग और भारत की सभ्यता की दृष्टि से बहुत समृद्ध शासनकाल था। शाहजहां के शासनकाल में मुगल साम्राज्य अपने शान शौकत, ख्याति के चरमोत्कर्ष पर था।

 

 

 

शाहजहां के दरबार में देश विदेश के अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तियों की सदैव उपस्थिति बनी रहती थी। शाहजहां मुगल बादशाह की हैसियत से अपने शासन के प्रारंभिक चरण में पूर्णतया इस्लाम का पक्षधर था परन्तु कालांतर में दारा शिकोह और जहां आरा के प्रभाव के कारण सहिष्णु बन गया था।

 

 

 

शाहजहां ने अपने शासनकाल में 1636-37 के मध्य पायवोस और सिजदा प्रथा को बंद करने का आदेश दिया था जिससे यह दोनों प्रथा समाप्त हो गयी। पायवोस और सिजदा प्रथा के समापन के उपरांतशाहजहां ने एक नयी प्रथा का आरंभ कराया जिसे ‘चहार तस्लीम’ कहा जाता था।

 

 

 

इसके साथ ही यह हुक्म जारी किया कि बादशाह की तस्वीर वाली पगड़ी कोई नहीं पहनेगा। बादशाह की बागडोर संभालने के बाद शाहजहां ने कई नीतियों में बदलाव के तहत इलाही संवत के स्थान पर हिजरी संवत आरंभ किया। हिन्दू धर्मावलंबी की तीर्थ यात्रा पर कर लगाया परन्तु कुछ समय पश्चात हटा दिया।

 

 

 

शाहजहां के शासनकाल में हिन्दू रसूखदारों के लिए मुसलमान गुलाम रखने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया था। अकबर और जहांगीर के शासनकाल में गौ हत्या निषेध कानून को समाप्त कर दिया जिससे गौ हत्या को प्रोत्साहन मिला। शाहजहां के शासनकाल में आरंभिक सफलता के रूप में 1614 में मेवाड़ विजय का उल्लेख है।

 

 

 

दिल्ली सल्तनत के बादशाह खुर्रम को 1606 ई. में 8000 जाट और 5000 सवार मनसब के रूप में प्राप्त हुए थे। शाहजहां ने अपनी बेगम आरज़ूमंद बानो (मुमताज महल) को विवाह के पश्चात ‘मलिका ए जमानी’ की उपाधि से नवाजा था। 1631 में प्रसव पीड़ा के पश्चात जब मुमताज महल की मृत्यु हुई तब शाहजहां ने अपनी बेगम की याद में आगरा में यमुना नदी के तट पर विश्वविख्यात इमारत का निर्माण कराया।

 

 

 

शाहजहां ने जब 1616 ई. में दक्षिण भारत अभियान में विजय प्राप्त किया तब 1617 में जहांगीर ने उसे शाहजहां की उपाधि दिया था। शाहजहां ने अपने शासनकाल के 1633 में अपने सम्पूर्ण साम्राज्य में नवनिर्मित हिन्दू मंदिरो को धराशायी करने का फरमान जारी कर दिया जिसके परिणाम स्वरुप बनारस, इलाहाबाद, गुजरात और कश्मीर के अनेक हिन्दू मंदिरो को जमींदोज कर दिया गया।

 

 

 

इतना ही नहीं शाहजहां ने अपने शासन के दौरान जुझार सिंह और उनके पारिवारिक सदस्यों को बल पूर्वक इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए मजबूर कर दिया। शाहजहां ने 1934 में यह फरमान जारी किया था कि कोई भी मुसलमान लड़की हिन्दू लड़के से तब तक शादी नहीं कर सकती जब हिन्दू लड़का इस्लाम स्वीकार नहीं करता है।

 

 

 

इस्लाम स्वीकार करने के पश्चात ही कोई हिन्दू लड़का मुसलमान लड़की से शादी करने का हकदार था। शाहजहां का पुर्तगालियों के साथ युद्ध होने पर उसने आगरा के सारे गिरजाघरों को ध्वस्त करा दिया। अपने शासनकाल के सातवे वर्ष में शाहजहां ने यह मुनादी करवा दिया कि यदि कोई व्यक्ति स्वेछा से मुसलमान बनता है तो उसे अपने पैतृक सम्पत्ति में हिस्सा प्राप्त हो जायेगा।

 

 

 

शाहजहां ने अपने शासन में हिन्दू धर्म के लोगो को मुसलमान बनाने के लिए एक अलग विभाग की व्यवस्था किया था जो उसके हिन्दू धर्म के विरोधी मानसिकता का परिचायक था। शाहजहां ने मुहम्मद साहब के मकबरे के लिए 250000 के मूल्य की हीरे जवाहरात जड़ित मशाल भेंट किया था और मक्का के धर्म गुरु को 50000 रुपये भेंट स्वरुप दिए थे।

 

 

 

शाहजहां की एक ऐसे बादशाह के रूप में पहचान होती है जिसने अपने पराक्रम से निजामशाही और आदिलशाही की चुनौती को मुंहतोड़ जवाब दिया था। शाहजहां को कलाकारों के गुण को प्रोत्साहित करने वाले तथा स्वयं के रसिक व्यवहार के लिए पहचाना जाता है जिसने अपनी रसिकता और कला को प्रोत्साहन देने में ताजमहल जैसी अद्वितीय कृति निर्माण करा दिया।

 

 

 

शाहजहां एक विद्वान शहजादा था। जिसे उसके पिता बादशाह जहांगीर ने राजशास्त्र, भूगोल, पारसी भाषा, इतिहास, वैदिक शास्त्र, युद्ध, राज्य की व्यवस्था इत्यादि की शिक्षा का उचित प्रबंध किया था। 1611-12 में शहजादा खुर्रम का विवाह आरजू मंद बानो (मुमताज महल) से हुआ था।

 

 

 

इन दोनों के विवाह का शाहजहां (खुर्रम) के राज काज में बहुत महत्वपूर्ण उपयोग था। शाहजहां एक पराक्रमी शासक, योद्धा था। उस दौर के आदिलशाह और कुतुबशाह दोनों ने ही शाहजहां की अधीनता स्वीकार किया था। निजामशाह की तरफदारी करते हुए अकेले शाहजी भोसले ने शाहजहां से मोर्चा लेते हुए संघर्ष किया।

 

 

 

परन्तु शाहजहां की विशाल सेना और कुशल रणनीति के सामने शाहजी भोसले परास्त हो गए तथा इसके साथ ही निजाम शाही का भी समापन हो गया। भारत में आंतरिक दुश्मनो के समाप्त होने के पश्चात शाहजहां ने अपना ध्यान मध्य एशिया में समरकंद की तरफ लगाया।

 

 

 

परन्तु 1639-48 तक बहुत प्रयास और खर्च करने के बाद भी शाहजहां को समरकंद पर सफलता नहीं प्राप्त हो सकी। इस तरह ज्ञात होता है कि शाहजहां एक कुशल रणनीतिकार, पराक्रमी योद्धा, विद्वान शासक था। धार्मिक आलोचनाओं को छोड़कर उसके कार्यकाल को भारत का संबद्ध काल कहा जा सकता है।

 

 

 

पूरा नामअल् आजाद अबुल मुजफ्फर साहब उद्दीन बेग़ मुहम्मद ख़ान ख़ुर्रम
जन्म5 जनवरी 1592
जन्मस्थानलाहौर किला, लाहौर, मुगल साम्राज्य
पिताजहांगीर
पत्नीकन्दाहरी बेग़म, अकबराबादी महल, मुमताज महल , हसीना बेगम, मुति बेगम, कुदसियाँ बेगम, फतेहपुरी महल, सरहिंदी बेगम
बच्चेपुरहुनार बेगम , जहाँआरा बेगम , दारा शिकोह , शाह शुजा , रोशनआरा बेगम , औरंग़ज़ेब , मुराद बख्श, गौहरा बेगम
धर्ममुस्लिम
राज्याभिषेक4 फ़रवरी 1628
माताजगत गोसाई ( जोधाबाई )

 

 

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