मोरोपंत तांबे का जीवन परिचय | Moropant Tambe Biography Hindi

आज के इस नए आर्टिकल में हम आपक Moropant Tambe Biography Hindi भाषा में देने जा रहे हैं, आप नीचे मोरोपंत तांबे जी के बारे में डिटेल में पढ़ सकते हैं।

 

 

 

Moropant Tambe Ka Jivan Parichay

 

 

 

पूरा नाम मोरोपंत तांबे 
पिता का नाम बलवंत राव तांबे
माता का नाम ——
भाई सदाशिव तांबे 
पत्नी भागीरथी बाई
पुत्री रानी लक्ष्मीबाई 
राष्ट्रीयताभारतीय 
जाति ब्राह्मण 
धर्म हिन्दू 
दामाद गंगाधर राव नेवालकर
Date Of Birth1803
Moropant Tambe Death Date1856 ( Age 53 Years )

 

 

 

 

 

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मोरोपंत तांबे देशभक्त और महान वीर नारी मणिकर्णिका (मनु) (रानी लक्ष्मीबाई) के पिता थे। मोरोपंत तांबे विठूर के पेशवा के यहां दरबार में अपनी सेवा प्रदान करते थे। मोरोपंत तांबे का जन्म 1803 में हुआ था। मोरोपंत तांबे के भाई का नाम सदाशिव तांबे और पिता नाम बलवंत राव तांबे था।

 

 

 

 

मोरोपंत हिन्दू धर्म से संबंधित थे मोरोपंत की पत्नी का नाम भागीरथी बाई था। मोरोपंत और भागीरथी बाई की एकमात्र संतान का नाम (मनु) था जो बाद में इतिहास प्रसिद्ध झाँसी की वीर रानी लक्ष्मीबाई के नाम से विख्यात हुई जिसने भारत को स्वतंत्र कराने के लिए अंग्रेज शासन के खिलाफ जीवन के अंतिम समय तक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुई।

 

 

 

 

देशभक्त बहादुर पिता मोरोपंत की संतान वीर रानी लक्ष्मीबाई भी बहुत बहादुर और देशभक्त थी। मोरोपंत तांबे पेशवा बाजीराव द्वितीय के दरबार में सेवारत थे। मोरोपंत के पिता का नाम बलवंत राव तांबे और उनके भाई का नाम सदाशिव तांबे था। मोरोपंत तांबे का जन्म 1803 में हिन्दू धर्म के ब्राह्मण खानदान में हुआ था।

 

 

 

 

मोरोपंत तांबे की शादी भागीरथी बाई से हुई थी। तांबे दम्पत्ति को विवाहोपरांत एक कन्या रत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम मणिकर्णिका रखा गया था।

 

 

 

 

मणिकर्णिका को सभी लोग प्यार से मनु कहते थे। मणिकर्णिका तांबे दम्पत्ति की एकलौती संतान थी तथा मणिकर्णिका का जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी जनपद (भारत) में 19 नवंबर 1828 को हुआ था।

 

 

 

 

मणिकर्णिका ही बाद में झाँसी की रानी से प्रसिद्ध हुयी। समय की क्रूर चाल ने मात्र 4 वर्ष की अवस्था में मणिकर्णिका की माता भागीरथी बाई को छीन लिया। मोरोपंत अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद पेशवा बाजीराव द्वितीय के पास आकर रहने लगे।

 

 

 

 

इन्होने अपनी पुत्री मणिकर्णिका के उज्वल भविष्य के लिए अपना दूसरा विवाह नहीं किया तथा अपनी पुत्री को पिता के प्यार के साथ ही माता का भी प्यार दिया। मोरोपंत ने अपनी पुत्री मणिकर्णिका की शिक्षा के लिए शिक्षक के पास भेजते थे तथा उसके बालो में कंघी करते हुए बाल संवारते थे।

 

 

 

 

इस प्रकार मोरोपंत अपनी पुत्री का बहुत ध्यान रखते थे। उसे कभी अपनी माता का अभाव महसूस नहीं होने दिया। एक दिन मोरोपंत अपनी पुत्री का भाग्य जानने के लिए एक ज्योतिषी के पास गए और मणिकर्णिका का हथेली ज्योतिषी को दिखाया।

 

 

 

 

ज्योतिषी मोरोपन्त से बोला – आपको फ़िक्र नहीं करनी चाहिए आपकी पुत्री की हथेली में राजयोग बना है अतः इसे रानी ही बनना है। ज्योतिषी की बात सुनकर मोरोपंत को प्रसन्नता हुई परन्तु विश्वास नहीं हुआ। बचपन से ही मोरोपंत की पुत्री मणिकर्णिका बहुत नटखट स्वभाव की थी।

 

 

 

 

विठूर के पेशवा बाजीराव द्वितीय मणिकर्णिका को ‘छबीली’ नाम से बुलाते थे। विठूर में मणिकर्णिका को सभी लोग ‘मनु’ कहते थे। पेशवा बाजीराव द्वितीय ने मनु की देख रेख में कोई कमी नहीं आने दिया। उसे अपनी पुत्री से भी बढ़कर ध्यान रखते थे।

 

 

 

 

पेशवा बाजीराव द्वितीय ने ‘नाना साहेब’ को दत्तक पुत्र स्वीकार किया था। नाना साहेब भी मनु को छबीली नाम से ही पुकारते थे तथा मनु को अपनी छोटी बहन मानते थे। मनु (मणिकर्णिका) बचपन से ही नाना साहेब और तात्या टोपे के साथ खेलती थी तथा उसके खेल में मुख्य रूप से घुड़सवारी, युद्धाभ्यास और अस्त्र शस्त्र का संचालन जुड़ा हुआ था।

 

 

 

 

मनु, नाना साहेब और तात्या टोपे को अपना गुरु मानती थी तथा इनसे ही सभी युद्ध कलाओ का प्रशिक्षण लिया था। प्रत्येक पिता की तरह मोरोपंत की भी दिली इच्छा थी कि मनु का विवाह किसी अच्छे खानदान में हो जाय। मोरोपंत, बाजीराव पेशवा द्वितीय के खासमखास थे अतः पेशवा ने उनकी पुत्री मनु की शिक्षा दीक्षा का समुचित प्रबंध कर रखा था।

 

 

 

 

मोरोपंत अपनी पुत्री की चिंता में डूबे रहते थे क्योंकि मनु की माता का साया उसके बचपन में ही उठ गया। वह मोरोपंत की एकमात्र संतान थी एक दिन मोरोपंत अपनी पुत्री मनु से पूछ बैठे बेटा हम आपका विवाह कर दे? मनु ने तत्काल उत्तर देते हुए कहा – हमे विवाह नहीं करना है हम आपको छोड़कर कही नहीं जायेंगे क्योंकि हमारे जाने के बाद आपकी सेवा कौन करेगा?

 

 

 

 

मनु की बात सुनकर मोरोपंत रुधे गले से बोले – बेटा प्रत्येक लड़की के लिए ससुराल जाना ही नियत है। कोई भी लड़की अपने मायके में नहीं रहा करती है। मनु विवाह नहीं करने के जिद पर अड़ी हुई थी तथा अपने पिता मोरोपंत के गले लग गयी।

 

 

 

 

एक बार जब झाँसी नरेश गंगाधर राव का विठूर आगमन हुआ तब उनके समने मनु की विवाह करने की बात चलाई गयी। झाँसी नरेश गंगाधर राव इस रिश्ते को स्वीकार करने के लिए शरह तैयार हो गए। मणिकर्णिका के साथ विवाह के समय गंगाधर राव की उम्र 40 वर्ष थी तथा मणिकर्णिका की उम्र मात्र 14 वर्ष थी।

 

 

 

 

झाँसी नरेश गंगाधर राव के साथ मणिकर्णिका का नाम परिवर्तित करके ‘लक्ष्मीबाई’ रखा गया। अपनी पुत्री के विवाह के पश्चात स्वाभाविक रूप से मोरोपंत तांबे अकेले हो गए। उनोने अपनी पुत्री मनु के सुखी भविष्य की जिम्मेदारी का पूर्ण रूपेण निर्वहन किया था।

 

 

 

 

मोरोपंत विठूर में पेशवा के यहां ही जीवन यापन करने लगे। समय के साथ ही मोरोपंत ताँबे के ऊपर भी उम्र के चौथेपन का असर हो रहा था परन्तु मोरोपंत सदैव ही प्रत्येक परिस्थिति के लिए तैयार रहा करते थे। ब्राह्मण थे अतः मोरोपंत की युद्ध में अधिक सक्रियता नहीं थी।

 

 

 

 

अंग्रेजो के विरुद्ध 1860 के दशक में मोरोपंत ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था। ऐसा प्रचलित है कि उस समय में जब अंग्रेजो की सेना ने कानपुर पर आक्रमण किया था तब नाना साहेब, तात्या टोपे और अंग्रेजी सेना के साथ मोरोपंत ने भी अंग्रेजो के विरुद्ध भीषण युद्ध में भाग लिया था।

 

 

 

 

इस युद्ध में अंग्रेजो की सेना पराजित हो गयी थी परन्तु अंग्रेजो ने पुनः कानपुर पर आक्रमण कर दिया। पुनः एक बार मोरोपंत ने नाना साहेब, तात्या टोपे के साथ सहयोग करते हुए अंग्रेजो के विरुद्ध भयानक आक्रमण किया। कानपुर के वीर सैनिको को मोरोपंत ने प्रत्येक अवसर पर सहायता प्रदान किया।

 

 

 

 

अंग्रेजो के विरुद्ध आक्रमण में मोरोपंत का एक पैर पूर्णरूप से क्षतिग्रस्त हो गया। एक पैर क्षतिग्रस्त होने पर भी मातृभूमि की सेवा के लिए मोरोपंत ने धूर्तबाज अंग्रेजो के समक्ष कभी नतमस्तक नहीं हुए। भारत माता के लिए मोरोपंत ने स्वयं को बलिदान कर दिया पर झुकना स्वीकार नहीं किया।

 

 

 

 

यह घटना मोरोपंत को वीर, महान देशभक्त दर्शाने के लिए पर्याप्त है। मोरोपंत की आहुति प्रत्येक देशवासियो को गर्व से भर देती है। कई इतिहासकारो के अनुसार मोरोपंत अंग्रेजो की गिरफ्त में आ गए थे अंग्रेजो ने उन्हें फांसी देने का आदेश दिया था। यह समाचार झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई के लिए बहुत ही दुखद था।

 

 

 

 

अपने पिता की रक्षा के लिए रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजो के विरुद्ध आक्रमण किया परन्तु वीर रानी लक्ष्मीबाई को 18 मई 1858 को ग्वालियर के समीप एक बाग़ में वीरगति प्राप्त हुई। एक आंकलन के अनुसार बहादुर मोरोपंत तांबे की मृत्यु जून 1858 में हुई थी।

 

 

 

 

मोरोपंत एक महान देशभक्त थे उन्होंने खुद की परवाह न करते हुए फिरंगी सेना के विरुद्ध मोर्चा लिया और मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए लड़ते रहे। मणिकर्णिका (लक्ष्मीबाई) में भी अपने पिता की वीरता, साहस, युद्धकला विरासत में मिली थी। पिता और पुत्री ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए परन्तु मातृभूमि की मान मर्यादा पर आंच नहीं आने दिया।

 

 

 

 

प्रत्येक भारतीय के हृदय में इन महान व्यक्तित्व वाले क्रांतिकारियों की अमिट छाप विद्यमान है। प्रत्येक भारतवासी को अपने देश के महापुरुषों तथा महान वीरांगना नारियो पर सदैव ही गर्व रहेगा।

 

 

 

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