बाल मुकुंद गुप्त का जीवन परिचय और अन्य पूरी जानकारी

आज के इस आर्टिकल में हम आपको Balmukund Gupt ka jeevan parichay देने जा रहे हैं, आप इसे नीचे से पढ़ सकते हैं और पूरी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

 

 

 

Balmukund Gupt Biography in Hindi

 

 

 

 

 

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हिंदी काव्य साहित्य में अनेक विद्वान मनीषी हुए है जिन्होंने अपनी काव्य सृजनता से हिंदी साहित्य को सम्बृद्ध करने का कार्य किया है। अनेक विद्वान मनीषियों में से एक नाम बाल मुकुंद गुप्त का है जिन्होंने हिंदी भाषा तथा उर्दू भाषा की रचना में अपनी लेखनी चलाई है।

 

 

 

 

बाल मुकुंद गुप्त को उर्दू भाषा के नामचीन लेखकों में माना जाता है जिन्होंने खड़ी बोली तथा आधुनिक हिंदी साहित्य को स्थापित करने वाले लेखकों में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इन्हे भारतेन्दु युग तथा द्विवेदी युगीन कवि के रूप में ख्याति प्राप्त है जो दोनों (भारतेन्दु, द्विवेदी) के बीच की एक कड़ी के रूप में पहचाने जाते थे।

 

 

 

 

बाल मुकुंद का जन्म हरियाणा के जिला रोहतक में गुड़ियानी गांव में 14 नवंबर 1865 को हुआ था। बाल मुकुंद के पिता का नाम पूरनमल गोपाल था। इनके परिवार को सभी लोग ‘बख्शीराम वालो’ के नाम से जानते थे। बाल मुकुंद का सांसारिक जीवन 15 वर्ष की आयु में प्रारंभ हो गया तथा एक प्रतिष्ठित परिवार की कन्या अनार देवी के साथ बाल मुकुंद का विधि पूर्वक विवाह संस्कार संपन्न हुआ था।

 

 

 

 

इन्होने अपनी आरंभिक शिक्षा उर्दू भाषा में ग्रहण किया परन्तु बाद में इन्होने हिंदी भाषा का ज्ञान अर्जित किया। पारिवारिक कारण स्वरुप बाल मुकुंद गुप्त को आठवीं कक्षा तक ही शिक्षा प्राप्त हो सकी किन्तु मेधा के धनी बाल मुकुंद गुप्त स्वाध्याय के बल से काफी ज्ञान अर्जित करने में सफल हो गए थे।

 

 

 

 

बाल मुकुंद गुप्त अपने जीवनकाल मे ‘राष्ट्रीय नव जागरण’ के सक्रिय पत्रकार थे। इनके लिए पत्रकारिता स्वाधीनता सग्राम के लिए एक हथियार बन गया था। बाल मुकुंद ने खड़ी बोली और आधुनिक हिंदी साहित्य को स्थापित करने वाले लेखकों के साथ बहुत सहयोग किया।

 

 

 

 

बाल मुकुंद ने अपनी विद्वता मेधा के बल पर हिंदी भाषा के साथ बांग्ला भाषा की पुस्तकों का उर्दू में अनुवाद किया इस कारण से ही इनकी लेखन कला में निर्भीकता के दर्शन होते है। बाल मुकुंद गुप्त की रचनाकृतियो में व्यंग्य विनोद का पुट दृष्टिगत होता है। इन्हे शब्दों की परख का अद्भुत ज्ञान था।

 

 

 

 

अनस्थिर शब्द की शुद्धता को लेकर इनकी महावीर प्रसाद द्विवेदी से अधिकाधिक बहस होती रहती थी। अनस्थिर शब्दों को लेकर बाल मुकुंद गुप्त बहुत मुखर रहते थे तथा अनेक शब्दों पर इन्होने बहस किया था। बाल मुकुंद ने विद्यार्थी जीवनकाल से ही उर्दू भाषा के समाचार पत्रों में अपनी लेखनी को मूर्तरूप देना आरंभ कर दिया था।

 

 

 

 

इन्होने उर्दू भाषा के ‘रिफाहे आम’ अख़बार तथा मथुरा से प्रकाशित होने वाला अख़बार ‘मथुरा समाचार’ के उर्दू मासिक समाचार पत्र के लिए दीन दयाल शर्मा के सहयोगी के रूप में कार्य किया। बाल मुकुंद गुप्त ने 1886 में चुनार से प्रकाशित होने वाले उर्दू अख़बार ‘अखबारे चुनार’ का दो वर्षो तक सम्पादन कार्य किया।

 

 

 

 

इन्होने लाहौर से प्रकाशित होने वाले उर्दू समाचार पत्र ‘कोहेनूर’ का 1888 से 1889 तक सम्पादन कार्य किया। बाल मुकुंद प्रतापनारायण मिश्र के सम्पर्क में कार्य करने के साथ हिंदी पुराने साहित्य का पूर्ण रूप से अध्ययन करने में सफल हुए तथा प्रतापनारायण मिश्र को अपना काव्य गुरु स्वीकार किया था।

 

 

 

 

बाल मुकुंद गुप्त ने अपने गृह राज्य हरियाणा के पैतृक गांव गिडियानी में निवास करते हुए मुरादाबाद से प्रकाशित होने वाले उर्दू भाषा के मासिक पत्र ‘भारत प्रताप’ का सम्पादन किया करते थे तथा इसके साथ ही अंग्रेजी भाषा का अध्ययन भी करते रहे।

 

 

 

 

इन्हे 1893 में ‘हिंदी बंगवासी’ का सहायक संपादक के रूप में कलकत्ता जाने का अवसर प्राप्त हुआ जहां पर इन्होने 6 वर्षो तक कार्य किया परन्तु नीति संबंधी मतभेद होने के कारण ‘हिंदी बंगवासी’ के संपादक पद से इस्तीफा दे दिया। इन्होने 1899 में कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र ‘भारत मित्र’ का सम्पादन कार्य भी किया।

 

 

 

 

बाल मुकुंद के साहित्य सृजन की कई विशेषताएं थी। इन विशेषताओं के कारण ही इनका नाम गिने चुने लेखकों में शामिल हो गया। बाल मुकुंद ग्रुप के साहित्य में देश प्रेम की भावना के साथ ही ब्रिटिश सम्राज्य का विरोध, गाँधीवादी विचारधारा के प्रति लगाव और प्रतिपादन, समाज सुधार पर बल, के साथ साहित्य में व्यंग्य विनोद का प्रमुख स्थान है जिसके कारण इन्हे प्रख्यात लेखकों में इनका नाम सम्मिलित हो गया।

 

 

 

 

बाल मुकुंद गुप्त अपने लेखकों को आधार बनाकर ब्रिटिश साम्राज्य का खुले रूप में विरोध करते थे कारण कि इन्हे ब्रिटिश हुकूमत द्वारा भारतीयों पर किया जुल्म अत्याचार स्वीकार नहीं था। गुप्त जी के विचार देशप्रेमी की भावना ओत प्रोत थे। इन्हे देशप्रेम के आगे सभी वस्तुए गौण प्रतीत होती थी।

 

 

 

 

बाल मुकुंद गुप्त के हृदय पटल पर गांधी जी की शांतिवादी विचारधारा का काफी प्रभाव था। इनके लिखे गए लेखो में समाज सुधार की बातो का अधिक उल्लेख मिलता है। बाल मुकुंद गुप्त ने अपनी लेखनी के माध्यम से अनेक प्रकार के व्यंग्य बाण चलाये थे जो इनकी एक खास पहचान स्थापित करने में सहायक थी।

 

 

 

 

ऐसे मेधावी साहित्यिक पुरुष बाल मुकुंद ने मात्र 42 वर्ष की उम्र पार करने की स्थिति में 18 सितंबर 1907 को दिल्ली में लाला लक्ष्मीनारायण की धर्मशाला में रहते हुए अनंत यात्रा पर निकल गए। अपने जीवनकाल में बाल मुकुंद गुप्त ने अनेक विषयो पर अपनी लेखनी चलाई।

 

 

 

 

कई समाचार पत्रों का सम्पादन किया तथा एक व्यंग्यकार और निर्भीक पत्रकार के रूप में ख्याति अर्जित किया। इन्होने साहित्य सृजनता के साथ ही सामाजिक समानता के लिए भी प्रयास किया।

 

 

 

 

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